Wednesday, June 16, 2010

सफर: चंडीगढ से शिमला















(
माफी चाहूंगा दोस्तों बीच मे यह यात्रा कथा क्रम टूट गया था जिसके कारण आपको असुविधा तथा निराशा हुई होगी। वजह दो रही है एक तो मैं शिमला से लौटने के बाद ऐसे निर्जन स्थान पर चला गया था वहाँ किसी भी प्रकार के संचार-सूचना के साधन नही थे और कुछ मैं यात्राओं मे इतना मशगुल हो गया था कि प्रमादवश लिखने का मन भी नही हुआ,लेकिन मेरे जेहन मे सब कुछ मौजुद है जैसा भी मेरा तज़रबा रहा इस सफर का,अब किस्तो मे आपके साथ बांटता चलूंगा आपको भी भी शायद रोचक लगे...।)

...बात वही से शुरु करता हूं जहां से छोडी थी रात के ढाई बजे चंडीगढ पहूंचने के बाद वहां पर घटित हुए नाटकीय घटनाक्रम के बाद हम तीनो ने चंडीगढ से टैक्सी से ही रवानगी ली। आगे वाली सीट पर राजीव जी ने आसन ग्रहण किया और हम दोनो पीछे वाली सीट पर विराजमान हो गये,चूंकि मै मनोविज्ञान की मास्टरी करता हूं और मुकेश जी ध्यानमार्ग के साधक इसलिए दोनो ने एक स्वर मे यह जान लिए कि राजीव के अन्दर नेतृत्व करने का छिपा हुआ कीडा है जो धीरे-धीरे सामने आने लगा सो हम दोनो ने मौन निर्णय किया कि राजीव को ये जिम्मेदारी दे दी जाए कि हमे आनन्दपूर्वक शिमला तक पहूंचा दे सो हम दोनो रिलेक्स मुद्रा मे आ गये। राजीव ने हमारा परिचय पूछा मैने बताया कि मै विश्वविद्यालय मे मनोविज्ञान विषय की मास्टरी करता हूं और मुकेश जी ने राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार के पेशे को त्यागकर ध्यानमार्ग का चयन किया है जिस पर उसको आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। मुकेश जी के मौन मे उसकी जिज्ञासा बढती जा रही थी और मुझ पर सवालो की बौछार क्योंकि मुकेश जी तो मौन मे है जो जान ही चूका था सो यहाँ इस यात्रा मे मेरी भूमिका मुकेश जी के व्याख्याता के रुप मे हो गई, उसकी जिज्ञासाएं और सवालो की आवृति और गंभीरता उत्तरोत्तर बढती ही गई। इसी क्रम मे,मै आपको राजीव के बारे मे बता दूं जैसाकि उसने बताया कि वह दिल्ली का रहने वाला है रेडीमेड गारमेंट का अपना बिजनेस है मैन्यूफैक्चरर है और उसके माल की सप्लाई पूरे हिमाचल प्रदेश मे होती है अपने बिजनेस पार्टीयों से मुलाकात और वसूली के सिलसिले मे वह हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर है।

वह भी श्री श्री रविशंकर का चेला है और आर्ट आफ लिविंग के शिविर मे जाता है उसने ने एकाध बार एकदिनी मौन साधना का प्रयास किया पत्नि को बाधा मानता है मौन व्रत करने के लिए।

वेद,दर्शन,मनोविज्ञान,उपनिषद,संस्कृत,नैतिकता और धर्म के तात्विक पक्ष उसके बातचीत के प्रिय विषय है अब आप मेरी स्थिति का खुद अन्दाजा लगा सकते है कि मुकेश जी के मौन मे होने के कारण मैने कैसे उसकी जिज्ञासाओं को शांत किया होगा? बडा ही मजेदार और नया अनुभव था मेरे लिए यह क्योंकि मै अधिकारपूर्वक तो केवल मनोविज्ञान विषय पर ही बोल सकता है लेकिन फिर भी उपरोक्त विषयों पर जितना अल्पज्ञान था मैने अपनी पूरी उर्जा से तर्क सम्मत ढंग से संतुष्ट करने का प्रयास किया,लेकिन जिस गति से सवाल करता था वह भिन्न-भिन्न विषयों पर एक साथ मुझे भी कई बार सोचना पड जाता था। सबसे ज्यादा दिक्कत मै मुकेश जी को लेकर उसके सवालो पर महसूस कर रहा था क्योंकि मुझे उनके मार्ग की व्याख्या करनी होती थी वह भी बडी सावधानी के साथ कंही कुछ अतियुक्ति न हो जाए, बीच-बीच मे मुकेश जी भी मेरा सहयोग कर रहे थें जब सवाल उनसे सम्बन्धित होते थे वे अपना संक्षिप्त पक्ष लिख कर मुझे बता देते थे लेकिन वह विस्तार मे जाना चाहता था जिसके लिए मुझे व्याख्या करनी होती थी।

चूंकि वह नियमित रुप से हिमाचल आता जाता रहा है इसलिए उसकी टैक्सी ड्राईवर से खुब पटनी शुरु हो गई उनकी बातों के प्रमुख विषय हिमाचल के रास्ते,प्रमुख ढाबे,पुलिस और रिसोर्ट आदि थे हम जिन्हे साक्षी भाव से सुन रहे थे।

इस टैक्सी का ड्राईवर भी एक अजीब ही कैरेक्टर था हम जो भी बात करते थे वह उनमे खुद ही शामिल हो जाता था बात चाहे हिमाचल की करें या दिल्ली मैटरो की वह ऐसा प्रतीत करवा देता था कि कोई भी विषय उसकी जानकारी से परे नही है।

राजीव के सम्बोधन मे हमारे नाम ऐसे शामिल हो गये थे जैसे कि बरसो से हमारी जान पहचान हो।राजीव और ड्राईवर की बातचीत से यह साफ पता चल रहा था कि उनको चंडीगढ-शिमला मार्ग के ऐसी जगहो की बखुबी जानकारी थी कि जहाँ स्वादिष्ट खाना मिलता है,मसलन दोनो ही चटोरे थे।

इसी बीच राजीव ने अधिकार के साथ प्रस्ताव रखा कि मुकेश मै आप लोगो को ऐसी जगह परांठो का नाश्ता कराऊंगा कि आप याद रखेंगे वहाँ के स्वाद को जिन्दगी भर। रात भर के सफर मे और उसकी थकान के बीच इस प्रस्ताव ने हमारे चेहरो पर चमक और ताजगी दोनो पैदा कर दी और मौन स्वीकृति भी एक स्वर हमने दी,फिर उसने ड्राईवर से उस ढाबे की पुष्टि भी की तो हम और भी आश्वस्त हो गये। रास्ते मे एक जगह रुककर चाय पी वह भी डबल डोज के साथ यह सोलन के आस-पास की कोई जगह थी वही पर मूत्र-विर्जन भी किया गया पहली बार। इसके बाद हम हर उस ढाबे को उत्सुकता की नज़र से देखते जहाँ राजीव थोडा सा भी सक्रिय होता था क्योंकि उसके प्रस्ताव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमारी भुख के सन्दर्भ मे समान रुप से हो रहा था,लेकिन थोडी खीज़ इस बात पर बढती जा रही थी कि वह कोई भी ढाबे के निकल जाने पर ड्राईवर से कहता था कि अरे ! आपने वहाँ नही गाडी रोकी, फिर कहता चलो आगे देखेंगे।

आखिर वह घडी आ ही गई उसने हिमानी रिसोर्ट पर गाडी अधिकार के साथ रुकवा दी और बोला चलो पहले फ्रेश हो लेते है फिर नाश्ता करेंगे। हम भी अधिकार के साथ उस तीन सितारा रिसोर्ट की लाबी मे अपनी बारी की प्रतिक्षा करने लगे और वहाँ बिखरी हुई पत्रिकाओं को पलटने लगे लेकिन नजर परांठो पर ही लगी हुई थी पेट मे भी जठराग्नी रस ने अपना काम शुरु कर दिया और भुख बढती ही जा रही थी,फिर बारी-बारी से हम तीनो कुलीन शौचालय मे फ्रेश हो गये।

मै और मुकेश जी राजीव की बाहर खडे इस प्रत्याशा मे इंतजार कर रहे थे कि वह आये और कहे कि चलो नाश्ता तैयार है कर लेते हैं। अब राजीव बाहर आया और अप्रत्याशित रुप से आकर हमसे कहा कि यहाँ ठीक नही है कही आगे चलकर नाश्ता करेंगे यह बात बाहर खडा गार्ड भी सुन रहा था इस पर वह राजीव से बोला साहब नाश्ता तैयार है आप ऐसे नही जा सकते है यह कोई धर्मशाला या बस अड्डा नही है जो यूं ही फ्रेश हो कर चल पडोगे ,हम भी बेशर्मी से सब बात सुन रहे थे लेकिन चुप थे मुकेश जी की तरह मै भी मौन हो गया था और थोडा असहज भी क्योंकि बडे ही अधिकार से फ्रेश हुए थे हम दोनो, फिर वह अन्दर गया और मैनेजर से बात करके सहजतापूर्वक बाहर आ गया और ड्राईवर से कहा गाडी निकालो ! अब हमे लगने लगा कि यह इस तरह से हगने-मूतने के मामलो का एक्सपर्ट है क्योंकि वह बहुत सहज़ था।

लेकिन पेट की भी फिक्र हो रही थी थोडी देर तक गाडी मे सन्नाटा पसरा रहा और फिर अंतत: उसने एक सडक किनारे वाले ढाबे पर गाडी रुकवा ही दी,जहाँ पर हम तीनो ने नाश्ता किया उसने जैसे ही मीनू कार्ड से चयन की सुविधा दी मैने मुकेश जी की मौन सहमति के साथ आलू-प्याज़ के परांठो का आर्डर दिया दही के साथ, मुकेश जी ने परांठो से पहले नींबू पानी और बाद मे चाय का क्रिएटिव आउटपुट जोडा जिससे मेरा मन प्रसन्न हो गया। राजीव ने भी हमारा अनुसरण किया और 191/- के बिल का भुगतान किया,हम दोनो ने औपचारिकतावश बिल देने का आग्रह किया लेकिन उसने मना कर दिया वैसे भी हमारा मन तो कतई नही था बिल देने का क्योंकि इतना तडफा के नाश्ता करवाया था उसने शायद वह हमारे धैर्य की परीक्षा ले रहा था।

नाश्ता करते-करते हुए राजीव ने अपने पिता की कैंसर से लडी जंग का किस्सा सुनाया कि आंत का कैंसर होने के बाद भी कैसे वे उससे लड कर आ निरोग जीवन बिता रहे हैं,मैने इस प्ररेणादायक घटना और राजीव के पिताजी के साहस की तारीफ की तो मुकेश जी ने उन्हें अपने पिता के अनुभवों पर एक किताब लिखने का सुझाव दिया।

इसके बाद हम शिमला की तरफ बढे जा रहे थे,इसी बीच राजीव ने हमारे समक्ष एक आफर रखा कि यदि कभी जून के बाद एकाध महीने के लिए मनाली रुकना हो तो वहाँ पर उसका अपनी लीज़ पर लिया हुआ मकान है जिसमे रुका जा सकता है,हमने कोई अतिरिक्त उत्साह वाली प्रतिक्रिया नही दिखाई जिसकी उसे पक्की उम्मीद थी। मैने कहा अगर जरुरत होगी तो आपको जरुर याद किया जाएगा जिससे वह भी संतुष्ट हो गया।

इसके बाद हम तीनो ने झपकियाँ ली और हमारी आंखे शिमला मे जाकर ही खुली जब ड्राईवर ने कहा साहब ! आपको किस जगह जाना है? मुकेश जी ने मुझे सूचित किया मैने बता दिया। इसके बाद फोन पर सम्पर्क मे रहने के परिपक्व भावुक वायदे हुए उसके लिए हम जैसे लोगे अजूबे से कम नही थे...बेपरवाह और खानाबदोश।

शिमला पहूंच गये हैं ,यहाँ कि किस्सागोई एक विराम के बाद...।

डा.अजीत

3 comments:

  1. बहुत खूब यात्रा वृतांत। अब आप लोगों ने शिमला में क्या किया यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है। इंतजार कर रहा हूं। जल्द बताइए
    http://udbhavna.blogspot.com/

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  2. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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